पाठा (Velvet leaf)

     पाठा एक ऐसी वनस्पति है जिसे आपने अक्सर सड़कों या खेतों के किनारे की झाड़ियों में देखा होगा। आयुर्वेदिक ग्रंथों में पाठा का भरपूर उल्लेख पाया जाता है। इसे दाइयों की जड़ी भी कहा जाता है क्योंकि अनेक प्रकार के स्त्री रोगों तथा प्रसव तथा बार-बार होने वाले गर्भपात आदि में यह काफी लाभकारी होता है। पाठा आरोही लता जाति का एक पौधा है। यह पेड़ों के सहारे ऊपर चढ़ती है या जमीन पर फैलने है। इससे लता पर लता निकलती रहती है और इसकी लता पत्तों भरी होती है। इसकी लताएँ रेखित, पतली तथा रोमयुक्त होती हैं। इसके पत्ते गिलोय के पत्ते जैसे तथा सुगन्धित होते हैं। इसके पत्ते हल्के नुकीले तथा गोल, फूल छोटे औऱ सफेद रंग के और फल मकोय जैसे छोटे-छोटे होते हैं। फलों का रंग लाला होता है। पाठा स्वाद में कड़वा तथा तीखा होता है। यह जल्दी पच जाता है लेकिन पेट के लिए गरम होता है। इसमें काफी मात्रा में फाइबर यानी रेशे होते हैं। यह कफ तथा वात को शान्त करता है। पाठा के दो प्रकार हैं – छोटा और बडी़। गुण दोनों के समान हैं। 

पाठा के उपयोग

  1. पाठा के जड़ का चूर्ण बनाकर नाक से सूँघने (नस्य लेने) पर आधासीसी या अधकपारी (माइग्रेन) के दर्द में बहुत आराम मिलता है।
  2. पाठा के तेल की 1-2 बूँदें नाक में डालने से पुराने जुकाम में लाभ होता है।
  3. पाठा, तेजोवती, रसाञ्जन तथा यवक्षार को बराबर मात्रा में मिला कर पीस कर बारीक चूर्ण बना लें। इस 1-2 ग्राम चूर्ण में शहद मिलाकर 250-250 मिग्रा की गोलियां बना लें। सुबह-शाम एक-एक गोली मुँह में रखकर चूसने से मुँह के रोगों में लाभ होता है।
  4. घी में बनाई गई पाठा की सब्जी में दही तथा अनार के रस को मिलाकर सेवन करने से दस्त बंद होते हैं।
  5. एक ग्राम पाठा की जड़ तथा एक ग्राम आम की गुठली की मींगी को गाय के दूध से बने हुए दही में पीसकर पिएं। तेजी के साथ बार-बार होने वाले पतले दस्त तथा दस्त के समय होने वाले दर्द में निश्चित लाभ होगा।
  6. भैंस के दूध से बने दही के छाछ के साथ पाठा के पत्ते की चटनी 1-2 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से दस्त बंद होते हैं।
  7. 50-50 ग्राम अंकोल, पाठा, दारुहल्दी तथा मुलेठी की चटनी की 500 मिग्रा की गोलियाँ बना लेें। इसका सेवन करने से सभी प्रकार के दस्त में आराम होता है।
  8. 1-2 ग्राम पाठा के जड़ की चटनी को चावल के धोवन के साथ पीने से तिल्ली की सूजन दूर होती है।
  9. पाठा, अतीस, कुटज, कुटज का छाल, नागरमोथा, कुटकी, धातकीफूल, रसौत तथा बेलफल के चूर्ण को मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण की 1-2 ग्राम मात्रा चावल के धोवन के साथ पीने से कब्ज, पेचिश, खूनी दस्त, बवासीर तथा गुर्दे के दर्द में लाभ होता है।
  10. धमासा, बेलफल का गूदा तथा जीरा और सोंठ में से किसी भी एक के चूर्ण में पाठा के चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में मिला लें। इस मिश्रण को छाछ में मिलाकर थोड़ा नमक मिलाकर सेवन करने से बवासीर के कारण होने वाले दर्द में आराम होता है।
  11. 200 मिली छाछ में 100 मिली अनार का रस, 500 मिग्रा जीरा, एक ग्राम अजवायन, 5 ग्राम गुड़, 500 मिग्रा सोंठ तथा एक ग्राम पाठा चूर्ण मिला लें। इसे पीने से बवासीर के रोगी को गैस का निकलना कम होता है तथा मल आराम से निकल जाता है।
  12. पाठा, अगरु एवं हल्दी का काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से कफ के कारण होने वाले प्रमेह यानी डायबिटीज में लाभ होता है।
  13. गुडूची यानी गिलोय और चित्रक के 10-20 मिली काढ़े में पाठा, कुटज, हींग, कुटकी तथा कूठ का 1-3 ग्राम चूर्ण अथवा कल्क (चटनी) मिला लें। इसका सेवन करने से पुरुषों को यौन रोगों से छुटकारा मिलता है।
  14. डायबिटीज यानि मधुमेह का रोगी यदि दवा ना लेना चाहता हो तो और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भोजन करने वाला हो तो उसे पाठा के गाढ़े आसव में अधिक मात्रा में मधु मिलाकर पिलाना चाहिए। इससे दवा लेने की रुचि पैदा होगी और भोजन करने में भी वह परहेज बरतने लगेगा।
  15. पाठा के जड़ की चटनी को प्रसव की अवस्था में स्त्री की योनि में लेप करने से सामान्य प्रसव कराने में मदद मिलती है तथा बिना प्रसव के समय कष्ट कम हो जाता है।
  16. पाठा का उपयोग गर्भपात की समस्या को भी दूर करता है। 1-2 ग्राम पाठा के पत्तों को दूध में पीसकर पीने से असमय होने वाले गर्भपात में लाभ होता है।
  17. पाठा, त्रिकटु तथा कुटज की छाल काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मिली मात्रा में पीने से मासिक धर्म से संबधित रोगों में लाभ होता है।
  18. पाठा की जड़ को चावल के धोवन के साथ पीसकर कुष्ठ रोगों के घावों पर लेप करें। इससे कुष्ठ रोग ठीक होता है।
  19. माता का दूध बढ़ाने के लिए तथा उसकी शुद्धि के लिए पाठा का प्रयोग काफी लाभकारी है। पाठा, सोंठ आदि दूध को शुद्ध करते हैं और उसे बढ़ाते हैं। इनका काढ़ा बनाकर 10-30 मिली मात्रा में पीने से स्तन सुडौल (पुष्ट) होता है तथा दूध भी बढ़ता है।
  20. इससे माँ के दूध से संबधित अन्यान्य बीमारियाँ जैसे दूध न पचना, कम आना आदि भी ठीक हो जाती हैं।
  21. पाठा, मूर्वा, चिरायता, देवदारु, सोंठ, इन्द्रयव, सारिवा तथा कुटकी का काढ़ा बना लें। इसे 10-30 मिली काढ़ा को पीने से माँ का दूध शुद्ध होता है।
  22. हड्डी टूटने पर पाठा के पत्तों को पीस कर लेप कर दें। इससे हड्डियां ठीक से जुड़ जाती हैं।
  23. पीव से भरे घाव घाव को ढकने के लिए पाठा के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। ढेर सारे मुंह वाले घाव यानी कारबंकल को भी पाठा ठीक करता है।
  24. 1-2 ग्राम पाठा के जड़ के चूर्ण में मधु मिलाकर सेवन करने से कारबंकल ठीक होता है।
  25. पाठा के पत्ते को पीसकर लेप करने से एक्जीमा, घाव, आग से जले हुए अंग पर तथा खुजली आदि में लाभ होता है।
  26. पाठा, खस एवं सुगन्धवाला (एक जड़ी जिसे नेत्रबाला भी कहते हैं) को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 10-20 मिली मात्रा में पीने से पेट में पड़ा अनपचा भोजन पच जाता है और बुखार दूर होता है।
  27. पाँच ग्राम पाठा के जड़ को 200 मिली दूध में पका लें। इसे तीन दिन तक सुबह-शाम सेवन करने से ठंड और कंपकंपाहट सहित आने वाला मलेरिया बुखार उतर जाता है।
  28. पाठा, हल्दी, छोटी कटेरी, मोथा, जीरा, पिप्पली, पिप्पली का जड़, चव्य, चित्रक तथा सोंठ सभी को पीस कर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को गर्म पानी में मिलाकर सूजन वाले स्थान पर लेप करने से सूजन दूर होती है।
  29. पाठा तथा पञ्चकोल का घोल बनाकर उसमें घी या तेल से छौंक लगाकर सेवन करें। इससे सूजन आदि रोगों में लाभ होता है।

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