काकोदुम्बर (Wild fig)

     काकोदुम्बर गुलर का फूल या कठूमर का एक किस्म होता है। लेकिन इस अनजान गुलर के किस्म के अनगिनत गुणों के कारण आयुर्वेद में काकोदुम्बर को औषधी के रूप में उपयोग किया जाता है। काकोदुम्बर के वृक्ष के पुराने हो जाने पर इसकी छाल गांठदार हो जाती है। गूलर या अंजीर वृक्ष के समान ही इसके सब अंगों को तोड़ने पर दूध निकलता है। इसका वृक्ष बहुत जल्दी बढ़कर 2-3 वर्षों में फल देने लगते हैं। यह शीघ्र बढ़ने वाला, सदाहरित लगभग 5-8 मी ऊँचा, छोटा वृक्ष होता है। इसके तने की टहनियां-नये अवस्था में सफेद से भूरे रंग के होते हैं।  इसके पत्ते गुलर के पत्ते जैसे ही, परन्तु उससे कुछ बड़े, 10-30 सेमी लम्बे, 5-15 सेमी चौड़े, स्पर्श में खुरदरे तथा शीर्ष पर नुकीले होते हैं। इसके फूल गोलाकार, अण्डाकार, गूलर या अंजीर के फल जैसे ही, किन्तु उनसे कुछ छोटे या रोमश तथा पके अवस्था में हरे-पीले रंग के होते है।

काकोदुम्बर का उपयोग

  1. काकोदुम्बर के कच्चे फलों को सिरके के साथ पीसकर उसमें नमक मिलाकर सिर में लगाने से खालित्य (सिर का गंजापन) में लाभ होता है।
  2. काकोदुम्बर पात्राधानी से बने काढ़े से गरारा करने से गले में होने वाली गाँठ के इलाज में मदद मिलती है।
  3. पके फल के मज्जा को पीसकर गले में लगाने से गलगण्ड (घेंघा) में लाभ होता है।
  4. काकोदुम्बर के 1-2 ग्राम कोमल पत्तों को पीसकर, 100-200 मिली गाय के दूध में पकाकर उसमें 500 मिग्रा पिप्पली चूर्ण मिलाकर पीने से खाँसी, साँस फूलना आदि रोगों में लाभ होता है।
  5. 1-2 बूंद काकोदुम्बर आक्षीर (दूध) को बतासे में डालकर खिलाने से अतिसार या दस्त तथा प्रवाहिका या पेचिश में लाभ होता है।
  6. काकोदुम्बर के पत्तों को पीसकर अर्श यानि बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से मिटते हैं।
  7. 1-3 ग्राम काकोदुम्बर के जड़ के चूर्ण को शहद तथा घी के साथ मिलाकर चटाने से रक्तार्श (खूनी बवासीर) में लाभ होता है।
  8. 5 मिली काकोदुम्बर के फल के रस का सेवन करने से यकृत् या लीवर संबंधित बीमारियों में लाभ होता है।
  9. गुलर की जड़ का काढ़ा बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पिलाने से पाण्डु या एनीलिया, कामला, सूजाक या गोनोरिया तथा प्रमेह या डायबिटीज में लाभ होता है।
  10. 2-4 ग्राम काकोदुम्बर फल के चूर्ण में शहद एवं शर्करा मिलाकर खाने से प्रदर या लिकोरिया के उपचार में फायदा मिलता है।
  11. 2-4 ग्राम काकोदुम्बर की जड़ के छाल का चूर्ण बनाकर शहद के साथ दिन में 3-4 बार देने से ज्वर या बुखार तथा प्रदर  में लाभ होता है।
  12. चिकित्सा में विरेचन (शरीर से मल मूत्र निकालने के लिए)  के लिए गुड़ के साथ काकोदुम्बर के रस का प्रयोग उपयुक्त है। श्वित्र रोग के कारण उत्पन्न स्फोटों को फोड़कर, उनसे पूय निकालकर, 15 दिन तक रोज सुबह काकोदुम्बर की छाल, विजयसार का सार भाग, प्रियंगु तथा शतपुष्पा का काढ़ा बनाकर, आवश्यकतानुसार पीने से श्वित्र रोग में जल्दी लाभ होता है।
  13. काकोदुम्बर के तने का छाल या फली को पीसकर ग्रंथि (गांठ) पर लगाने से गांठ बैठ जाती है।
  14. काकोदुम्बर के पत्ते को पीसकर लगाने से रोमकूप में सूजन (बालतोड़) में लाभ होता है।
  15. काकोदुम्बर के तने से प्राप्त आक्षीर (सफेद दूध) को दद्रु या रिंगवार्म पर लगाने से लाभ होता है।
  16. काकोदुम्बर के जड़ का काढ़ा बनाकर पिलाने से कण्डु या खुजली, दद्रु, रक्तविकार तथा व्रण या घाव आदि त्वचा विकारों में फायदेमंद होता है।
  17. 2-4 ग्राम काकोदुम्बर की छाल के चूर्ण को चावल के धोवन के साथ पीने से ऊर्ध्वगत रक्तपित्त में लाभ होता है।
  18. 5-10 मिली काकोदुम्बर जड़ के रस को दिन में दो बार पीने से बुखार कम होने में मदद मिलती है। इसमें शर्करा मिलाकर पीने से प्रदर का तथा शहद मिलाकर पीने से रक्तपित्त व रक्तस्राव कम होता है।
  19.  2-5 ग्राम सूखे फल के चूर्ण को जल में उबालकर पुल्टिस के रुप में प्रयोग करने से लसिकाग्रंथि  के सूजन को कम करने में मदद मिलती है।

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