मोठ (Dew bean)

     भारत में हिमालयी क्षेत्रों एवं अन्य उत्तर-पश्चिमी उष्णकटिबन्धीय भागों में लगभग1200 मी की ऊँचाई तक इसकी खेती की जाती है। इसके पत्र त्रिपत्रकयुक्त मूंग के पत्तों जैसे तथा हरे रंग के होते हैं। आचार्य सुश्रुत ने मोठ को कृमिकारक कहा है, परन्तु आचार्य चरक ने मोठ को रस और विपाक में मधुर तथा रक्तपित्त व ज्वर आदि विकारों में हितकर माना है।

मोठ के उपयोग

  1. रक्तातिसार-मकुष्ठ का यूष बनाकर 20-40 मिली मात्रा में सेवन करने से रक्तातिसार (रक्त के साथ अतिसार) संग्रहणी, कम्पवात में लाभ होता है।
  2. मोठ को भूनकर-पीसकर अन्य उबटन द्रव्यों के साथ मिलाकर त्वचा में लगाने से त्वचा की सुन्दरता बढ़ती है।
  3. ज्वर-मुकुष्ठ का यूष बनाकर 20-30 मिली यूष में 1 ग्राम पिप्पली चूर्ण मिलाकर पिलाने से ज्वर में लाभ होता है।
  4. स्थौल्य-मोठ को भूनकर चने के साथ मिलाकर खाने से स्थौल्य तथा मेदो विकारों का शमन होता है।
  5. मोठ को सोंठ, लहसुन या मेथी आदि वातशामक द्रव्यों के साथ मिलाकर सेवन करने से यह कम्पवात में अत्यन्त लाभप्रद होती है।
  6. मोठ का यूष बनाकर उसमें पुदीना, अदरख तथा अजवायन डालकर सूप बनाकर पीने से पथ्य तथा रुचिकारक होती है।

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