सागौन (Indian oak)

     समस्त भारत में 500 से 1200 मी0 की ऊचाईं तक इसकी खेती की जाती है। सागौन की लकड़ी का प्रयोग फर्नीचर तथा घरों के दरवाजे आदि बनाने में किया जाता है। कई स्थानों पर इसके पत्रों का प्रयोग भोजन के लिये पात्र रूप में किया जाता है। यह 24-30 मी ऊँचा वृक्ष होता है। इसके पत्र सरल, बड़े 30-60 सेमी लम्बे एवं 15-30 सेमी चौड़े होते हैं। इसके पुष्प अनेक, छोटे, श्वेत वर्ण के तथा मधुरगंधि होते हैं।

सागौन के उपयोग

  1. आधासीसी-सागौन की छाल के महीन चूर्ण को घृत में मिलाकर, छानकर नस्य लेने से आधासीसी में लाभ होता है।
  2. शिरशूल-सागौन की मूल को घिसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल का शमन होता है।
  3. नेत्र-विकार-सागौन के बीजों का क्वाथ बनाकर नेत्रों को धोने से नेत्र-विकारों का शमन होता है।
  4. श्वसनिका-शोथ-सागौन छाल को पीसकर गुनगुना करके वक्ष-प्रदेश पर लेप करने से श्वसनिका शोथ में लाभ होता है।
  5. प्रवाहिका-15-30 मिली सागौन छाल क्वाथ का सेवन करने से प्रवाहिका तथा उदरकृमियों का शमन होता है।
  6. अतिसार-1-3 ग्राम सागौन छाल चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है।
  7. मूत्र-विकार-1-3 ग्राम सागौन मूल चूर्ण में शक्कर तथा बकरी के दूध को मिला कर पीने से मूत्रावरोध तथा मूत्रदाह आदि विकारों का शमन होता है।
  8. अश्मरी-शर्करा-कपास बीज, अंकोल, निर्मली, सागौन बीज तथा नीलोत्पल चूर्ण (1-3 ग्राम) में समभाग गुड़ मिलाकर जल के साथ सेवन करने से अश्मरी में लाभ होता है।
  9. मूत्रावरोध-सागौन के फलों का क्वाथ बनाकर 15-30 मिली मात्रा में पिलाने से तथा सागौन के फलों को पीसकर नाभि के नीचे लेप करने से मूत्रावरोध में लाभ होता है।
  10. सागौन के फलों को पीसकर नाभि के नीचे लेप करने से मूत्रावरोध का शमन होता है।
  11. गर्भस्राव-प्रथम मास में गर्भवती त्री को यदि गर्भस्राव की आशंका हो तो समभाग मुलेठी, सागौन के बीज, क्षीरकाकोली तथा देवदारु के 2-4 ग्राम चूर्ण को दूध के साथ सेवन करना चाहिए।
  12. मूढ़गर्भ-सागौन की छाल, हींग, अतिविषा, पाठा, कुटकी तथा तेजोवती के 2-4 ग्राम चूर्ण को घी के साथ सेवन करने से मूढ़गर्भ निक्रमण तथा अपरापातन के उपरांत शेष दोषों का निर्हरण तथा वेदना का शमन होता है। तीन, पाँच या सात दिन के बाद पुन स्नेहपान कराना चाहिए।
  13. श्वेत प्रदर-सागौन की छाल का हिम बनाकर 15-30 मिली मात्रा में पिलाने से श्वेतप्रदर में लाभ होता है।
  14. कण्डू-सागौन बीज तैल की मालिश करने से खुजली का शमन होता है।
  15. रक्तस्राव-सागौन के पत्रों को पीसकर लेप करने से क्षत या व्रण जन्य रक्तस्राव का स्तम्भन होता है।
  16. 5 मिली सागौन पत्र-स्वरस का सेवन करने से आभ्यन्तर रक्तस्राव, रक्तविकार तथा शोथ का शमन होता है।
  17. स्थौल्य-सागौन छाल का क्वाथ बनाकर 15-30 मिली मात्रा में पिलाने से स्थौल्य में लाभ होता है।
  18. रक्तपित्त-सागौन पत्र का क्वाथ बनाकर 15-30 मिली मात्रा में पिलाने से रक्तपित्त में लाभ होता है।
  19. पित्तज विकार-सागौन छाल चूर्ण (1-3 ग्राम) में मधु मिलाकर सेवन करने से पित्तज विकारों का शमन होता है।
  20. शोथ-सागौन की मूल को पानी में घिसकर लगाने से पित्तज-शोथ का शमन होता है।

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