शणपुष्पी (Warted crotalaria)

     यह समस्त भारत में उसर तथा परती भूमि पर स्वत ही उत्पन्न होती है तथा कई स्थानों पर इसकी खेती की जाती है। इसका पौधा बहुशाखित तथा 60-90 सेमी ऊँचा  होता है। इसके पुष्प चमकीले पीले रंग के होते हैं। इसकी फली 2.5-3.8 सेमी लम्बी, दीर्घायत-बेलनाकार, सवृंत तथा बीज संख्या में 10-15, पीत वर्ण के, 5 मिमी लम्बे व चमकीले होते हैं।

शणपुष्पी के उपयोग

  1. उदर-विकार एव मुखगत व्रण-10-20 मिली पत्र क्वाथ का सेवन करने से अतिसार तथा प्रवाहिका का शमन होता है। तथा गण्डूष धारण करने से मुख रोग तथा कण्ठ रोगों में लाभ होता है।
  2. आमवात-पत्र तथा बीजों को पीसकर लगाने से आमवात में लाभ होता है।
  3. व्रण-शणपुष्पी के पत्रों को पीसकर व्रणों पर लगाने से गम्भीर व्रणों का रोपण शीघ्र होता है। तथा गुनगुना करके जोड़ों पर लगाने से वेदना तथा शोथ का शमन होता है।
  4. जंगली शणपुष्पी के पत्रों को पीसकर लगाने से पामा, पूययुक्त चर्म विस्फोट तथा अन्य त्वग् रोगों में लाभ होता है।
  5. पत्र तथा मूल को पीसकर लगाने से कुष्ठ में लाभ होता है।
  6. सूजन-शणपुष्पी के बीजों को पीसकर गुनगुना करके लेप करने से सर्वाङ्ग शोथ का शमन होता है।

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