मुद्गपर्णी (African gram)

     समस्त भारत में जंगली पौधे के रूप में लगभग2100 मी की ऊँचाई तक तथा हिमालयी क्षेत्रों में खरपतवार के रूप में इसकी लताएँ पायी जाती है। इसकी भूमि पर फैलने वाली, मूंग के समान लता होती है। इसकी फली 2.5-5 सेमी लम्बी, 3 मिमी व्यास की, सीधी, चिकनी तथा बेलनाकार होती है। प्रत्येक फली में 6-12, श्वेताभ-भूरे, चपटे, बेलनाकार बीज होते हैं। चरक-संहिता के जीवनीय, शुक्रजनन तथा मधुरस्कन्ध एवं सुश्रुत-संहिता के काकोल्यादि व विदारीगन्धादि-गणों में इसका वर्णन प्राप्त होता है।

मुद्गपर्णी के उपयोग

  1. मुद्गपर्णी के पत्तों को पीसकर नेत्र के बाहर चारों तरफ लगाने से नेत्ररोगों का शमन होता है।
  2. तृष्णा-समभाग पाटला, कमलकंद तथा मुद्गपर्णी से पकाए हुए शीतल जल (20 मिली) में 500 मिग्रा पिप्पलीचूर्ण मिलाकर पीने से तृष्णा का शमन होता है।
  3. प्रदर-मुद्गपर्णी से सिद्ध तैल से निर्मित पिचु को योनि में धारण करने से प्रदर का शमन होता है।
  4. कुष्ठ-समभाग पूतिकरंज, देवदारु, जटामांसी, पक्वसुरा, मधु, मुद्गपर्णी तथा काकनासा को पीसकर लेप लगाने से मण्डलकुष्ठ में लाभ होता है।
  5. घाव-मुद्गपर्णी को पीसकर घाव में लगाने से घाव जल्दी भरता है तथा सूजन कम हो जाती है।
  6. कण्डू (खुजली)-मुद्गपर्णी को पीसकर लगाने से कण्डू का शमन होता है।
  7. ज्वर-मुद्गपर्णी का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पिलाने से विषमज्वर में लाभ होता है।
  8. दौर्बल्य-मुद्गपर्णी के पत्र चूर्ण (1 ग्राम) में समभाग मिश्री मिलाकर खाने से बल बढ़ता है तथा दुर्बलता का शमन होता है।
  9. शोथ-मुद्गपर्णी को पीसकर शोथयुक्त-स्थान पर लगाने से शोथ का शमन होता है।

Comments

Popular posts from this blog

वेत्र (Common rattan)

खैर या खादिर (Black Catechu)

नींबू (Lemon)