भव्य (Elephants apple)

     यह पौधा समस्त भारत में नदी-नालों के किनारे तथा आद्र वनों 1200 मी0 की ऊचाई तक पाया जाता है। कुछ विद्वान कमरख को भव्य फल मानते है,किन्तु कमरख तथा भव्य फल आपस में पूर्णतया भिन्न है इसका वर्णन चरक व सुश्रुत-संहिता के सूत्र स्थान में प्राप्त होता है।
Dillenia indica Linn.  (भव्य फल) इसका पौधा लगभग 10-25 मी ऊँचा, मध्यम आकार का, सुन्दर व सदाहरित होता है। इसके पुष्प श्वेत वर्ण के व सुगन्धित होते हैं। इसके फल गोलाकार, छोटे नारियल के जैसे, कठोर छिलके वाले, लगभग 7-15 सेमी व्यास के, बाह्यदलों से घिरे हुए होते हैं।
उपरोक्त वर्णित भव्य फल के अतिरिक्त इसकी निम्नलिखित प्रजाति का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है। भारत के कई प्रदेशों में विशेषतया मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों में दीपावली के दिन लक्ष्मी का स्वरूप मानकर इस पौधे की पूजा की जाती है तथा पूजा-पाठ करने के लिए इसकी लकड़ी का पीढ़ा भी बनाया जाता है। इस वृक्ष के संदर्भ में कहा जाता है कि इसकी लकड़ी की खाट बनाकर सोने से शरीर की वेदनाओं का शमन होता है।
Dillenia pentagyna Roxb. (इषत्फल भव्य)- यह मध्यम आकार का लगभग 15 मी ऊँचा पर्णपाती वृक्ष होता है। इसकी छाल चिकनी, भूरे रंग की होती है। इसकी पत्तियां 20-50 सेमी लम्बी, 10-20 सेमी चौड़ी, आयताकार, किनारों पर कांटेदार तथा चमकीले हरे रंग की होती है। पुष्प पीले रंग के होते हैं। फल गोल कच्ची अवस्था में हरे तथा पकने पर पीले-नारंगी या लाल रंग के होते हैं। इसकी छाल तथा पत्रों का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग वेदना, मधुमेह, अर्श एवं त्वचा विकारों की चिकित्सा में किया जाता है। इसके फल विरेचक होते हैं। छाल का प्रयोग विस्फोट (फोड़े/पैंसी), भगन्दर, अंत पर्शुका शूल, दाह तथा फूफ्फूस शोथ की चिकित्सा में किया जाता है।

भव्य के उपयोग

  1. शिरशूल-भव्य के पुष्पों को पीसकर माथे पर लेप करने से शिरशूल का शमन होता है।
  2. कास-5-10 मिली भव्य फल स्वरस को शर्करा के साथ मिलाकर प्रयोग करने से खाँसी में लाभ होता है।
  3. आध्मान-भव्य पक्वफल स्वरस (5 मिली) का सेवन करने से आध्मान में लाभ होता है।
  4. उदरशूल-भव्य फल का प्रयोग उदर शूल व विबन्ध की चिकित्सा में किया जाता है।
  5. अतिसार-भव्य के पत्तों का क्वाथ बनाकर 5-10 मिली मात्रा में पिलाने से अतिसार में लाभ होता है।
  6. व्रण-भव्य पुष्पों को पीसकर लगाने से व्रण का रोपण होता है।
  7. मदात्यजन्य तृष्णा-चिलटा, खजूर, मुनक्का, फालसा तथा दाड़िम के 100 मिली स्वरस में सत्त्w और चीनी मिलाकर सेवन करने से मदात्य जन्य तृष्णा का शमन होता है।
  8. आक्षेप-10-15 मिली भव्य फल स्वरस में शर्करा मिलाकर सेवन करने से आक्षेप में लाभ होता है।
  9. शोथ-भव्य मूल तथा भव्य पत्र को पीसकर लेप करने से शोथ का शमन होता है।
  10. ज्वर-भव्य फल स्वरस को शर्करा के साथ मिलाकर सेवन करने से ज्वर में लाभ होता है।
  11. शोथ-भव्य के पत्तों में तैल लगाकर सुखोष्ण करके शोथ युक्त स्थान पर रखकर बाँधने से शोथ का शमन होता है।
  12. ऐंठन-पैरों में ऐंठन या जकड़न हो तो चालता छाल के रस में काली मिर्च को पीसकर लेप करें तथा इसके पत्तों को ऊपर से बाँध दें। एक या दो बार प्रयोग करने से अत्यन्त लाभ होता है।

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