समस्त भारत विशेषत हिमालय में लगभग 1200मी0 की ऊचाई तक इसके पौधे पाये जाते हैं। इसके पौधे लगभग 9 मी0 तक ऊचें व मजबूत कांटों से युक्त होते हैं। इसके फल गोल, कच्ची अवस्था में हरे पक्वावस्था में पीत वर्ण के तथा चिकने होते हैं। फल के सूख जाने पर मज्जा भी सूख जाती है, किन्तु बीज उसमें चिपके रहते हैं, इसे मदनफल पिप्पली कहते है। इसके बीज
कृष्णवर्ण के तथा फलमज्जा में दबे हुए होते हैं। चरकसंहिता में वर्णित वमनोपग दशेमानि में इसका उल्लेख नहीं है, किन्तु वमनार्थ मदनफल की प्रशंसा करते हुए मदनसर्वगदा विरोधि तु‘ ऐसा उल्लेख मिलता है। ग्रहणी में भल्लातक क्षार में मदनफल का प्रयोग एवं मदनपुष्प की शिरोविरेचन के रूप में गणना की गई है। चरकसंहिता के कल्प स्थान में मदनफल कल्प का वर्णन विशेष रूप से वमन हेतु प्राप्त होता है।
मैनफल के उपयोग
- अर्धावभेदक- समान मात्रा में मैनफल और मिश्री लेकर, थोडे से गाय के दूध के साथ पीसकर सूर्योदय से पहले ही 1-2 बूँद नाक में डालने से सूर्य उदय के साथ आरम्भ होने वाले शिर शूल का शमन होता है।
- शिरोरोग-4 पिप्पली, 1 मदनफल तथा 250 मिग्रा अफीम के चूर्ण को ताम्रपात्र में भूनकर, अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण कर 1-2 बूँद नाक में डालने से शिरशूल आदि मस्तिष्कगत विकारों का शमन होता है।
- कफ-पित्तज-विकार-2-3 अच्छे मैनफल लेकर, ऊपर का छिलका हटा दें और दरदरा कूटकर रात में 60 मिली जल में भिगों दें तथा प्रात काल अच्छी तरह मसल छानकर पीने से वमन होकर कफपित्त विकारों का शमन होता है।
- दमा-मैनफल, अर्कमूल त्वक् तथा मुलेठी तीनों को समान मात्रा में लेकर, चूर्ण कर 2-5 ग्राम की मात्रा में प्रयोग करें, यह दमा और जुकाम की उत्कृष्ट औषधि है।
- पार्श्वशूल-मदनफल को कांजी में पीसकर नाभि पर लेप करने से पसलियों के दर्द का शमन होता है।
- 6 ग्राम मैनफल बीज चूर्ण, 6 ग्राम सेंधानमक तथा 1y ग्राम पीपल के चूर्ण को गर्म जल के साथ देने से वमन होकर कफ निकल जाता है।
- 50 ग्राम मुलेठी को कूटकर 2 ली जल में पकाएं, 1 ली जल शेष रहने पर मसलकर छान लें। 6 ग्राम मैनफल के बीजों की मीगीं के चूर्ण को मधु तथा सेंधानमक मिश्रित 30 मिली मुलेठी क्वाथ के साथ सेवन करने से वमन द्वारा दोषों का निर्हरण हो जाता है।
- 3-6 ग्राम बीज चूर्ण को 25 मिली जल में एक घंटा भिगोकर पत्थर के खरल में घोंटकर कपड़छन कर, मधु और सेंधानमक मिलाकर खाली पेट पिलाने से वमन हो जाता है। (कफप्रधान ज्वर, गुल्म, दर्द (वेदना), जुकाम आदि में वमनार्थ इसका प्रयोग करते हैं।) (मैनफल के छिलके और गूदा को अलग कर बीजों को शुष्क कर कूटकर छिलके अलग कर केवल बीजों की गिरी के चूर्ण को महीन पीसकर शीशी में भरकर रख लें। (मात्रा 2 से 4 ग्राम प्रयोग करें।)
- उदरशूल-मदनफल तथा कुटकी दोनों को समान मात्रा में लेकर कांजी में पीसकर नाभि में लेप करने से उदरशूल में लाभ होता है।
- शूल-2-4 ग्राम मैनफल के बीज चूर्ण को कांजी अथवा छाछ में पीसकर, गर्म करके नाभि के चारों ओर लेप करने से उदरशूल का शमन होता है।
- मदनफल को सिरके में पीसकर नाभि के चारों ओर लेप करने से उदरशूल में लाभ होता है।
- प्रसूतिकष्ट-मदनफल के शुष्क फलों को जलाकर योनि का धूपन करने से प्रसव शीघ्र हो जाता है।
- बांझपन-मैनफल के 1 ग्राम सुखाए हुए बीज चूर्ण को दूध, शक्कर और केसर के साथ सेवन करने से तथा 1 ग्राम बीजों के चूर्ण की बत्ती बनाकर योनिमार्ग में धारण करने से योनिमार्ग और गर्भाशय के सब विकार दूर हो जाते हैं। मासिक-धर्म की रुकावट, वेदना, अनियमितता आदि कष्ट दूर हो जाते हैं। गर्भाशय की शुद्धि होकर त्री गर्भधारण कर सकती है।
- आमवातज शूल-मदनफल के पत्र तथा छाल को पीसकर लेप करने से आमवातज शूल में लाभ होता है।
- 140 ग्राम ताजे मक्खन को गर्म कर, उसमें 11.5 ग्राम मोम मिला दें, जब मोम पिघल जाए तो उसमें 11.5 ग्राम मैनफल चूर्ण और समभाग सेंधानमक मिलाकर रख लें। इसे निरन्तर 1 सप्ताह तक लगाने से हस्तपादगत दाह का शमन होता है और फटे हुए पैर कोमल एवं मुलायम हो जाते हैं।
- कण्डू-सिन्दूर, तुत्थ, मदनफल, सौवीरांजन तथा गुग्गुलु के चूर्ण से पकाए हुए सरसों के तैल को लगाने से खुजली में लाभ होता है।
- नाड़ीव्रण-समभाग मदनफल बीज तथा गुग्गुल को जल से पीसकर वर्ती बनाकर लेप करने से नए तथा पुराने दोनों तरह के नासूर में नाड़ीव्रणों का शोधन तथा रोपण होता है।
- व्रण-पौधे से निर्मित लेप को लगाने से व्रण का रोपण होता है।
- अपस्मार-मदनफल बीज चूर्ण तथा छोटे मदनफल चूर्ण को समान मात्रा में लेकर जल में पीसकर पीने से अपस्मार में लाभ होता है।
- ज्वर-ज्वर में दोषों की अधिकता हो तो उलटी करवाने के लिए मात्रानुसार मदनफल चूर्ण को पिप्पली चूर्ण या इन्द्रजौ अथवा मुलेठी के चूर्ण के साथ खाकर अनुपान में गुनगुने जल या मधु का शर्बत या ईख का रस या लवण युक्त जल का पान करना चाहिए। (यह क्रिया चिकित्सक की देखरेख में करनी चाहिए।)
- रक्तपित-अधोगत रक्तपित्त तथा हृदयगत दाह में मदनफल पिप्पली से पकाए हुए दूध का प्रयोग अथवा उस दूध से निर्मित क्षीर यवागु का प्रयोग करने से लाभ होता है।
- वामक होने के कारण इसका प्रयोग गर्भावस्था, अतिसार एवं बालकों में निषेध है।
- मदनफल वामक होता है, अत इसका प्रयोग चिकित्सकीय परामर्शानुसार करना चाहिए।
- उष्ण प्रकृति के व्यक्तियों में इसका प्रयोग सावधानी पूर्वक करना चाहिए।
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