माजूफल (Gall oak)
भारत में उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों में इसका वृक्ष पाया जाता है। इसका वृक्ष लगभग 2-5 मी0 ऊँचा होता है। इसकी नवीन शाखाओं में ऐडलीरिआ गैलीटिंकटोरी‘ नामक कीट अन्दर जाकर अण्डे देते हैं। उन अण्डों के आस-पास स्वरस एकत्रित होकर ग्रन्थि बनती है। कीटक सहित इस ग्रन्थि को माजूफल या मायाफल कहते हैं। माजूफल गोलाकर अथवा अंडाकार, 6-50 मिमी व्यास का, चिकना, चमकीला, धूसर, भूरे वर्ण का होता है।
माजूफल के उपयोग
- खालित्य-माजूफल को सिरके के साथ पीसकर सिर पर लगाने से खालित्य में लाभ होता है।
- नकसीर से आराम दिलाये माजूफल माजूफल चूर्ण का नस्य लेने से नकसीर में लाभ होता है।
- दंतरोग में फायदेमंद है माजूफल 1-1 भाग मंजिष्ठा, खदिर सार, कासीस, रूमीमस्तगी, 1/2 भाग तुत्थ तथा 4 भाग मायाफल के चूर्ण से दाँतों का मंजन करने से दंतरोगों का शमन होता है।
- दन्तवेष्ट-माजूफल के क्वाथ का गरारा करने से दन्तवेष्ट, रक्तष्ठीवन तथा दंत रोगों में लाभ होता है।
- मुखपाक- मायाफल क्वाथ या फाण्ट का कवल धारण करने से मुखपाक में लाभ होता है।
- माजूफल चूर्ण का दांतों पर मंजन करने से हिलते हुए दांत भी वज्र के समान मजबूत हो जाते हैं।
- कंठ शोथ कम करता है माजूफल मायाफल क्वाथ या फाण्ट का कवल धारण करने से कंठ तथा तालुमूलग्रन्थि शोथ में लाभ होता है।
- श्वास-कास-मायाफल के क्वाथ का कवल धारण करने तथा वाष्प का नस्य लेने से श्वास कास में लाभ होता है।
- आत्रसंबंधी-विकार-मायाफल का प्रयोग आत्रजन्य विकारों की चिकित्सा में किया जाता है।
- गुदव्रण-माजूफल चूर्ण का अवचूर्णन करके, माजूफल क्वाथ से गुदा को धोने से गुदभ्रंश, गुदव्रण तथा गुदाशोथ में लाभ होता है।
- योनि रोग-समभाग मायाफल तथा कपूर में मधु मिलाकर योनि में लेप करने से योनि शैथिल्य आदि विकारों का शमन होता है।
- सौजाकोपदंश-समभाग मायाफल, इलायची, खदिर सार (कत्था) तथा वंशलोचन के चूर्ण में चंदन तैल मिलाकर वटी बनाकर गर्मियों में मिश्री जल के साथ तथा शीतकाल में दूध के साथ 2-2 गोली प्रात सायं सेवन करने से सौजाकोपदंश में लाभ होता है।
- उपदंश-24 ग्राम श्वेत चंदन चूर्ण, 6-6 ग्राम मायाफल तथा खदिर सार (कत्था) के चूर्ण में 12 ग्राम चंदन तैल मिलाकर, 3-3 ग्राम की गोली बना कर मिश्री जल के साथ सेवन करने से नौ दिनों में ही उपदंश में लाभ होने लगता है। इसके सेवन काल में नमक रहित प्रचुर घृत युक्त गेहूँ एवं चने के आहार का सेवन पथ्य है।
- उष्णवात-18 दिनों तक समभाग रसाञ्जन, खदिर सार, पुरानी सुपारी तथा मायाफल के चूर्ण को 9 ग्राम की मात्रा में चने के तुष युक्त मिश्री जल के साथ सेवन करने से तीव्र उष्णवात में भी शीघ्र लाभ होता है।
- प्रदर-मायाफल चूर्ण में सिरका मिलाकर योनि में लेप करने से श्वेतप्रदर तथा रक्तप्रदर में फायदा मिलता है।
- पूयमेह-माया फल चूर्ण से निर्मित मलहम का लेप करने से तथा क्वाथ से प्रक्षालन करने से जीर्ण पूयमेह में लाभप्रद है।
- योनिशैथिल्य-मायाफल चूर्ण का पिचु धारण करने से योनि शैथिल्य का शमन होता है।
- अण्डकोषवृद्धि-माजूफल तथा अश्वगंधा को जल से पीसकर गुनगुना करके अण्डकोष में लगाने से लाभ होता है।
- शिरा स्फीत-मायाफल के उष्ण फाण्ट को स्फीत शिराओं की चिकित्सा में आभ्यन्तर एवं बाह्य स्वेदन के रूप में प्रयोग किया जाता है।
- त्वक् शोथ-पत्र कल्क का लेप करने से त्वक् शोथ में लाभ होता है।
- दद्रु-मायाफल चूर्ण को सिरके में मिलाकर लेप करने से दद्रु तथा खालित्य में लाभ होता है।
- व्रण-माजूफल की भस्म या चूर्ण तथा अनारफल भित्ति चूर्ण से धूपन करने से व्रण एवं जीर्ण व्रण में लाभ होता है।
- झांई- चेहरे की झाइयां दूर करने में भी माजूफल फायदेमंद होता है.माजूफल को सिरके के साथ पीसकर चेहरे पर लगाने से व्यंग, नलिका तथा झांई मिटती है।
- स्वेद दौर्गन्ध्य-माजूफल के महीन चूर्ण को शरीर पर मर्दन करके स्नान करने से स्वेदाधिक्य तथा स्वेद दौर्गन्ध्य का शमन होता है।
- वाजीकरण-जामुन पत्र-स्वरस से मायाफल की 250 मिग्रा की वटियाँ बनाकर सेवन करने से शुक्रस्राव, योनिस्राव तथा अतिसार का स्तम्भन होता है।

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