लोणी (Garden Purslane)

     यह समस्त भारत में लगभग 1500 मी की ऊँचाई  तक वर्षा ऋतु में इसके स्वयं जात पौधे उत्पन्न होते हैं। बिहार आदि कुछ स्थानों पर शाक हेतु इसकी खेती भी की जाती है। इसके पत्ते मांसल तथा चिकने होते हैं। पत्तों को मसलने पर एक विशिष्ट प्रकार की गन्ध आती है तथा पिच्छिल स्राव निकलता है। इसके पुष्प पीले रंग तथा छोटे होते हैं। इसकी शाक का प्रयोग विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के निर्माण व चिकित्सा में किया जाता है।

लोणी के उपयोग

  1. शिरशूल-लोनी के पत्तों को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल का शमन होता है।
  2. लोनी के पत्तों को पीसकर नेत्र के बाहर चारों ओर लगाने से नेत्र विकारों का शमन होता है।
  3. कर्णशूल-लोनी पत्र-स्वरस (1-2 बूंद) को कान में डालने से, कर्णशूल (कान दर्द) का शमन होता है।
  4. दन्तशूल-लोनी पञ्चाङ्ग को पीसकर दांतों पर रगड़ने से दन्तशूल का शमन होता है।
  5. मुंहासे-लोनी के बीजों को गोदुग्ध के साथ पीसकर लगाने से मुंहासे मिटते हैं।
  6. रक्तनिष्ठीवन-5 मिली लोनी पत्र-स्वरस का सेवन करने से रक्तनिष्ठीवन (थूक में रक्त आना) में लाभ होता है।
  7. लोनी के काण्ड एवं पत्र का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से आमाशयिक विकार मूत्रकृच्छ्र व अश्मरी का शमन होता है।
  8. मूत्र विकार-लोनी के पञ्चाङ्ग का काढ़ा बनाकर 15-20 मिली मात्रा में पिलाने से मूत्र-विकारों का शमन होता है।
  9. अर्बुद-लोनी के काण्ड एवं पत्र को पीसकर लगाने से अर्बुद तथा रसौली में लाभ हेता है।
  10. त्वक्-विकार-लोनी पत्र को पीसकर लेप करने से त्वक् रोग शोथ का शमन होता है।
  11. दग्ध-लोनी पत्र को पीसकर अग्निदग्ध (जले हुए) स्थान पर लगाने से लाभ होता है।
  12. विसर्प-लोनी के ताजे पत्रों को पीसकर लेप करने से विसर्प, खुजली तथा अन्य प्रकार के चर्मरोगों में लाभ होता है।
  13. दाहज्वर-लोनी पञ्चाङ्ग को पीसकर प्राप्त स्वरस का लेप करने से दाहयुक्त ज्वर का शमन होता है।
  14. ज्वर-लोनी के पत्तों का हिम बनाकर 15-20 मिली मात्रा में पिलाने से ज्वर का शमन होता है।
  15. वृश्चिक (बिच्छू) दंश-लोनी काण्ड एवं पत्र-स्वरस का दंश स्थान पर लेप करने से वृश्चिक (बिच्छू) दंश जन्य वेदना, शूल आदि विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।

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