ममीरा (Golden thread root)

     यह शाकीय पौधा समस्त भारत में मुख्यत आसाम, सिक्किम, पश्चिम बंगाल एवं अरुणाचल प्रदेश में पाया जाता है। इसके फल छोटी फलियों की तरह होते हैं और उनमें बहुत छोटे-छोटे तिल के समान बीज रहते हैं। ममीरा नेत्ररोगों की उत्तम औषधि है। इसकी जड़ें सुनहरे पीले रंग की रेशेयुक्त, स्वाद में कड़वी, टेढ़ी, बाहर से भूरी या श्याम वर्ण की तथा अन्दर से गाँठदार होती हैं। इसकी मूल का प्रयोग औषधि कार्य हेतु किया जाता है।

ममीरा के उपयोग

  1. अभिष्यन्द-ममीरा पत्र का अंजन बनाकर लगाने से अभिष्यंद (आँख का आना), दृष्टिदौर्बल्य, अव्रण शुक्ल तथा तिमिर आदि नेत्र रोगों में लाभ होता है।
  2. नेत्र रोग-ममीरा मूल का क्वाथ बनाकर नेत्रों को धोने से नेत्र विकारों का शमन होता है।
  3. दंतशूल-ममीरा मूल को दाँतों के बीच में रखकर चबाने से दंतशूल का शमन होता है।
  4. क्षुधावर्धनार्थ-ममीरा मूल का फाण्ट बनाकर 10-15 मिली मात्रा में सेवन करने से अरुचि का शमन होता है तथा क्षुधा (भूख) की वृद्धि होती है।
  5. अजीर्ण-ममीरा मूल चूर्ण (1-3 ग्राम) का सेवन करने से अजीर्ण व प्रमेह में लाभ होता है।
  6. मूत्रकृच्छ्र-ममीरा मूल का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से मूत्रकृच्छ्र व जीर्ण ज्वर में लाभ होता है।
  7. व्रण-ममीरा पत्र को पीसकर घाव पर लगाने से घाव जल्दी भरता है तथा सूजन मिटती है।
  8. ममीरा पत्र को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा विकारों का शमन होता है।
  9. ज्वर-1-2 ग्राम प्रकन्द चूर्ण तथा (10-20 मिली) क्वाथ का सेवन करने से विषम ज्वर में लाभ होता है।

Comments

Popular posts from this blog

वेत्र (Common rattan)

खैर या खादिर (Black Catechu)

नींबू (Lemon)