भूर्जपत्र (Himalayan silver birch)

     भारत में यह शीतोष्णकटिबंधीय हिमालय में कश्मीर में 2100-3600 मी तथा सिक्किम में 2700-4200 मी की ऊँचाई तक पाया जाता है। यह 12-15 मी तक ऊँचा, छोटे से मध्यमाकार का, पर्णपाती वृक्ष होता है। इसकी काण्डत्वक् श्वेत वर्ण की तथा अन्त त्वक् गुलाबी वर्ण की, कागज के समान पतली होती है, जो काण्ड से आसानी से पृथक् हो जाती है। इसके पत्र नवीन अवस्था में पीत वर्णी निर्यासी शल्कों से युक्त तथा चिपचिपे होते हैं। इसके पुष्प मंजरियों में लगे हुए होते हैं। इस वृक्ष की छाल को भोजपत्र कहते हैं। यह कागज के समान अथवा केले के सूखे पत्तें के समान होती है। प्राचीन काल में जब कागज उपलब्ध नहीं होता था, तब कागज के स्थान पर लिखने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था। इस पर लिखी पाण्डुलिपियां वर्षों तक सुरक्षित रहती हैं।

भूर्जपत्र के उपयोग

  1. कर्णस्राव-भोजपत्र काण्ड त्वक् का क्वाथ बनाकर कान को धोने से कर्णस्राव तथा कर्णवेदना का शमन होता है।
  2. अफारा-भोजपत्र की छाल का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पिलाने से आध्मान, कामला व पित्त-विकृतिजन्य ज्वर में लाभ होता है।
  3. कुष्ठ-भोजपत्र वृक्ष की गाँठ, लहसुन, शिरीषत्वक्, वचा, गुग्गुलु तथा सहिजन त्वक् के चूर्ण में सरसों का तैल मिलाकर लेप करने से कुष्ठ में लाभ होता है।
  4. मनशिला, भूर्जग्रन्थि, कुटज आदि द्रव्यों को पीसकर लगाने से कुष्ठ में लाभ होता है।
  5. ग्रन्थि विसर्प-बलामूल, नागबला, हरीतकी, भोजपत्र वृक्ष की गाँठ, बहेड़ा, वंश पत्र तथा अग्निमंथ को पीसकर लेप करने से ग्रन्थि विसर्प में लाभ होता है।
  6. व्रण-भोजपत्र वृक्ष की गाँठ, कासीस, त्रिवृत् तथा गुग्गुलु को पीसकर लेप करने से घाव जल्दी भर जाता है।
  7. जौ, घृत, भोजपत्र, मदनफल, गन्धविरोजा तथा देवदारु का धूपन करने से स्राव तथा वेदनायुक्त वातजव्रण में लाभ होता है।
  8. व्रण-काण्ड त्वक् क्वाथ से घाव को धोने से घाव जल्दी भर जाता है।
  9. योषापस्मार-काण्ड त्वक् से निर्मित फाण्ट (10-20 मिली) का सेवन करने से योषापस्मार में लाभ होता है।
  10. बालग्रह-पीली सरसों, नीम पत्र, अर्कमूल, वचा तथा भोजपत्र में घृत मिलाकर धूप देने से सभी प्रकार के बालग्रह शाँत होते हैं।

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