मांसरोहिणी (Red wood tree)

     समस्त भारत के शुष्क पर्णपाती पहाड़ी स्थानों में इसके वृक्ष पाये जाते हैं। इसका प्रयोग व्रण की चिकित्सा में किया जाता है। इसके प्रयोग से मांस को रोहण होता है इसलिए इसे मांसरोहिणी कहते हैं। इसका वृक्ष लगभग 25 मी0 ऊँचा होता है। इसकी काष्ठ को काटने से हल्के रक्त वर्ण का द्रव पदार्थ निकलता है। इसके फल कृष्ण वर्ण के तथा नाशपाती के आकार के होते हैं। चरक संहिता में बल्य तथा सुश्रुत-संहिता के न्यग्रोधादि गणों में इसका उल्लेख प्राप्त होता है।

मांसरोहिणी के उपयोग

  1. मुंह के छाले-मांसरोहिणी काण्ड-त्वक् का क्वाथ बनाकर गरारा करने से मुंह के छाले मिटते हैं।
  2. उदरशूल-काण्डत्वक् सत्त् का प्रयोग पेटदर्द की चिकित्सा में किया जाता है।
  3. अतिसार-1-2 ग्राम छाल चूर्ण का सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है।
  4. 1-2 ग्राम रोहिणी चूर्ण का सेवन करने से पुरानी आँव व अतिसार में लाभ होता है।
  5. मूत्र-विकार-1 ग्राम मांसरोहिणी त्वक् चूर्ण में सेंधानमक मिलाकर सेवन करने से मूत्र विकारों में लाभ होता है।
  6. स्तन्य-शोधनार्थ-10-20 मिली रोहिणी क्वाथ का सेवन करने से स्तन्य-विकारों का शमन होकर, स्तन्य का शोधन होता है।
  7. योनि रोग-मांसरोहिणी त्वक्-क्वाथ से योनि का प्रक्षालन करने पर योनि रोगों में लाभ होता है।
  8. योनि-व्रण-मांसरोहिणी की छाल को पीसकर योनि में लगाने से योनिव्रण का रोपण होता है।
  9. आमवात-त्वक् को पीसकर लेप करने से आमवात तथा आमवातजन्य शोथ में लाभ होता है।
  10. अस्थिभग्न-मांसरोहिणी त्वक् कल्क में उत्तमारिणी पत्र तथा भेड़ का दूध मिलाकर अस्थिभग्न पर लेप करने से शीघ्र लाभ होता है।
  11. गठिया-इसकी छाल का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से गठिया में लाभ होता है।
  12. व्रण-रोहिणी फल को बकरी के दूध में सात दिन तक रखें तथा बकरी के दूध में ही इस फल को बारीक पीसकर आघात वाले स्थान पर लगाएं, इससे शीघ्र ही व्रण का रोपण होता है।
  13. त्वचा विकार-रोहिणी छाल को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा के रोगों का शमन होता है।
  14. व्रण-रोहिणी काण्डत्वक् का क्वाथ बनाकर व्रण का प्रक्षालन करने से व्रण का शोधन तथा रोपण होता है।
  15. विषमज्वर-1 ग्राम मांसरोहिणी त्वक् चूर्ण का सेवन करने से मलेरिया में लाभ होता है।

  • इसका प्रयोग अत्यधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए।

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