मत्स्याक्षी (Sessile joyweed)

     यह सभी उष्णकटिबंधीय देशों में पाई जाती है। समस्त भारत में यह नमी वाले उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अंडमान एवं हिमालय में 1200 मी की ऊँचाई तक पाई जाती है। यह शाक जलासन्न या आर्द्र-भूमि में अधिक होती है।
Alternanthera sessilis (Linn.) R.Br. ex DC. (मत्स्याक्षी)-यह जमीन पर फैलने वाली, शाखा-प्रशाखायुक्त, वर्षायु, शाक होती है। इसकी शाखाएँ मूल से निकली हुई, फैली हुई, 7.5-45 सेमी लम्बी बहुधा बैंगनी वर्ण की, अरोमश होती हैं। इसके पत्र सरल, विपरीत, वृंतहीन, छोटे, लगभग 2.5-7.5 सेमी लम्बे एवं 0.3-2 सेमी चौड़े अग्रभाग नुकीले तथा हरे रंग के होते हैं। इसके पुष्प अत्यधिक छोटे, श्वेत अथवा गुलाबी वर्ण के होते हैं। इनके फूलों से मछली के समान गंध आती है। इसके फल अति चौड़े अधोमुख, हृदयाकार, गोलाकार अथवा अण्डाकार तथा बीज छोटे, चर्मिल, वर्तुलाकार, 1.2-1.5 मिमी व्यास के होते हैं। इसका पुष्पकाल फलकाल अगस्त से दिसम्बर तक होता है।
उपरोक्त वर्णित मुख्य प्रजाति के अतिरिक्त निम्नलिखित दो प्रजातियों का प्रयोग भी चिकित्सा में किया जाता है।
Alternanthera philoxeroides (Mart.) Griseb. (शिखर मत्स्याक्षी)- यह शाखा-प्रशाखायुक्त, आरोही, बहुवर्षायु जलीय शाक है। इसके नवीन पत्र तथा शाखायें श्वेत रोमों से आवृत होती हैं तथा जीर्णावस्था में चिकनी होती हैं। इसके पत्र विपरीत, भालाकार, 2-5 सेमी लम्बे, 0.7-2 सेमी चौड़े रोमश या चिकने होते हैं। इसके पुष्प श्वेत वर्ण के मुण्डकों में लगे हुए होते हैं। यह ज्वररोधी, शोथरोधी, गर्भस्रावी तथा मूत्रल होती है। इसका प्रयोग आत्रउद्वेष्ट, अतिसार, प्रवाहिका, आत्रशोथ, ज्वर, सुजाक, फूफ्फूस शोथ तथा श्वास की चिकित्सा में किया जाता है। पञ्चाङ्ग का प्रयोग विषाणुजन्य व्याधियों की चिकित्सा में किया जाता है।
Alternanthera pungens H.Bk (अणिमत्स्याक्षी)- यह जमीन पर फैलने वाला बहुवर्षायु शाकीय पौधा है। इसका काण्ड प्रबल, काष्ठीय तथा शाखा-प्रशाखायुक्त होता है। पत्र विपरीत, अण्डाकार, अग्रभाग पर नुकीले 1.5-4.5 सेमी लम्बे, 0.3-2.7 सेमी तक चौड़े होते हैं। इसका पञ्चाङ्ग मूत्रल होता है।

मत्स्याक्षी के उपयोग

  1. नेत्ररोग-मत्स्याक्षी पत्र-स्वरस में दुग्ध मिलाकर नेत्रों को धोने से नेत्राभिष्यंद (आँख का आना), अंजनामिका तथा कृमिग्रन्थि में लाभ होता है।
  2. अतिसार-मत्स्याक्षी कल्क को दही के साथ मिलाकर खाने से अतिसार तथा संग्रहणी में लाभ होता है।
  3. शुक्रमेह-मत्स्याक्षी मूल स्वरस (10 मिली) में सप्तपर्ण काण्ड त्वक् को पीसकर, गोदुग्ध के साथ सेवन करने से शुक्रमेह में लाभ होता है।
  4. मत्स्याक्षी पत्र-स्वरस (5 मिली) को दुग्ध के साथ सेवन करने से शुक्रमेह में लाभ होता है।
  5. पी]िड़का-पौधे को पीसकर लगाने से पिड़िका का शमन होता है।
  6. रोमकूपशोथ-मत्स्याक्षी मूल कल्क का लेप करने से रोमकूपशोथ में लाभ होता है।
  7. मत्स्याक्षी के पत्रों को पीसकर प्रभावित स्थान पर लगाने से कण्डु आदि त्वचा रोगों का शमन होता है।
  8. रसायन-ऐन्द्राr, मत्स्याक्षी, ब्राह्मी आदि द्रव्यों के चूर्ण (1-2 ग्राम) को घृत तथा मधु के साथ सेवन करने से रोग नष्ट होते हैं तथा मेधा, स्मृति, बल आदि के रसायन गुणों की प्राप्ति होती है।
  9. मत्स्याक्षी तथा शंखपुष्पी के 2-3 ग्राम चूर्ण में मधु, घृत व 25 मिग्रा स्वर्ण भस्म मिलाकर सेवन करने से शरीर सौष्ठव, मेधा, आयु, बल आदि रसायन गुणों की प्राप्ति होती है।
  10. सर्पदंश-मत्स्याक्षी काण्ड तथा पत्र को पीसकर दंश स्थान पर लेप करने से सर्पदंशजन्य विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।

Comments

Popular posts from this blog

वेत्र (Common rattan)

खैर या खादिर (Black Catechu)

नींबू (Lemon)