मरूवक (Sweet marjoram)
यह पौधा समस्त भारत में विशेषकर कर्नाटक, आंध्रप्रदेश तथा तमिल घरों की वाटिका में सुगन्धित पत्रों के कारण उगाया जाता है। तुलसी की तरह दिखने वाला यह पौधा अत्यन्त सुगन्धित होता है। इसका पत्र-स्वरस कृमिनाशक होता है। इसके पुष्प बैंगनी अथवा कदाचित् श्वेत वर्ण के तथा फल चिकने होते हैं। यह मूलत यूरोप तथा उत्तरी अफ्रीका का निवासी है। उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका में भी इसकी खेती की जाती है।
मरूवक के उपयोग
- शिर शूल-मरुवक के ताजे पौधे को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल का शमन होता है।
- पोथकी-मरुबक और लहसुन के स्वरस को मिलाकर 1-2 बूँद नेत्र में डालने से पोथकी में लाभ होता है।
- नेत्ररोग-मरुबक पत्रस्वरस से पलाश बीज चूर्ण को भावित कर अंजन करने से नेत्रशुक्र (फूली) में लाभ होता है।
- कर्णपूय-मरुवक पत्र-स्वरस (2-3 बूँद) को कान में डालने से कर्णपूय का शमन होता है।
- कास-5 मिली मरुआ पत्र-स्वरस में समभाग मधु मिलाकर सेवन करने से कास में लाभ होता है।
- 5-10 मिली मरुआ मूल-स्वरस का सुबह-शाम सेवन करने से क्षय रोग में लाभ होता है व उदरगत कृमियों का शमन होता है।
- उदरशूल-4 ग्राम मरुवक पत्र तथा बीज चूर्ण को सुबह-शाम उष्णोदक के साथ देने से उदरशूल में लाभ होता है।
- प्रवाहिका-मरुवक तैल को पेट पर मलकर स्वेदन करने से तीव्र प्रवाहिका में लाभ होता है।
- विबन्ध-मरुवक का 20-40 मिली फाण्ट बनाकर देने से विरेचन होकर विबन्ध का शमन होता है।
- मासिक विकार-मरुआ के 20-30 मिली फाण्ट को नियमित देने से रजविकारों में लाभ होता है।
- गठिया-मरुआ के पञ्चाङ्ग का क्वाथ बनाकर 20 मिली मात्रा में दिन में तीन बार पीने से गठिया रोग में लाभ होता है।
- मरुआ के पञ्चाङ्ग को पीसकर लगाने से त्वकविकार व मोच में लाभ होता है।
- वातव्याधि-मरुवक-स्वरस को वातव्याधि से पीड़ित अंग पर लगाने से वेदना व भल्लातक जन्य शोथ का शमन होता है।
- मरुवक स्वरस का लेप करने से भल्लातक जन्य शोथ का शमन होता है।
- कुष्ठ-मरुआ पत्र-स्वरस का लेप करने से कुष्ठ व दद्रु में लाभ होता है।
- वेदना शोथ-मरुआ की टहनियों को पानी में उबालकर बफारा देने से वेदना युक्त शोथ और संधिवात में लाभ होता है।
- वरटी विष-मरिच, सोंठ, सेंधानमक तथा सौवर्चल नमक में मरुबक पत्र-स्वरस मिलाकर लेप करने से वरटीजन्य (ततैया) विष प्रभाव का शमन होता है।
- वरटी (बर्रे, ततैया) दंश में सर्वप्रथम शत्र से दंश को निकाल कर उस स्थान पर मरुवक स्वरस को लगाने से दंश जन्य वेदना आदि प्रभावों का शमन होता है।
- अशुद्ध पारद सेवनजन्य-विकृति-अशुद्ध पारद अथवा उसके योग के सेवन से उत्पन्न विकृति के शमनार्थ 6-6 ग्राम पुदीना तथा मरुवक स्वरस में 50 ग्राम मिश्री तथा 20 मरिच मिलाकर, शीतल जल में घोल बनाकर पीना चाहिए
- विशेष :कई विद्वान को मरूआ मानते है; परन्तु यह मरूआ से भिन्न दूसरी प्रजाति है।

Comments
Post a Comment