यह विश्व में उत्तरी एशिया, नेपाल, एटलांटिक एवं जापान में प्राप्त होता है। भारत में उष्णकटिबंधीय हिमालय में काश्मीर में 2300 मी की ऊँचाई पर प्राप्त होता है।
यह पराश्रयी सदाहरित क्षुप होता है। इसका काण्ड अनेक शाखा-प्रशाखायुक्त, नलिकाकार तथा पीताभ-हरे वर्ण का होता है। इसकी शाखाएं द्विविभक्त या चक्राकार क्रम में निकली हुई होती हैं। इसके पत्र साधारण, विपरीत, आयताकार, वृंतरहित, विभन्न आकार के मोटे, चपटे, 2.5-5 सेमी लम्बे, फीके हरे रंग के तथा 3-5 शिरायुक्त होते हैं। इसके पुष्प एकलिंगी तथा गुच्छों में होते हैं। इसके फल अण्डाकार, श्वेतवर्णी, 6-8 मिमी व्यास के, चिकने, ताजी दशा में हरे तथा सूखने पर कृष्णाभ-भूरे रंग के व एकबीजयुक्त होते हैं।
बांदा के उपयोग
- कर्णपूय-बांदा फल स्वरस में थोड़ी-सी अपांप्म को घिसकर 1-2 बूंद कान में डालने से कर्णपूय का शमन होता है।
- झांई-बांदा को पीसकर चेहरे पर लगाने से झांई दूर होती है।
- हृद्विकार-डिजिटेलिस् की तरह इसका प्रयोग हृदयविकारों की चिकित्सा में किया जाता है।
- गुल्म-बांदा से निर्मित 20 मिली फाण्ट में 5 मिली एरण्ड तैल तथा 1 ग्राम सोंठ चूर्ण मिलाकर पिलाने से गुल्म में लाभ होता है।
- अत्यार्तव-10-20 मिली बांदा फाण्ट पिलाने से अत्यार्तव में लाभ होता है।
- संधिशोथ-बांदा को पीसकर इसमें राल तथा मोम मिलाकर लगाने से संधिशोथ तथा संधिशूल का शमन होता है।
- व्रण शोथ-बांदा के फलों को पीसकर लगाने से व्रणशोथ में लाभ होता है।
- ज्वर-बांदा पञ्चाङ्ग से निर्मित क्वाथ (10-20 मिली) का सेवन करने से ज्वर का शमन होता है।
- शोथ-बांदा को पीसकर लेप करने से शोथ का शमन होता है।
- इसका अत्यधिक सेवन करने से भम, ऐंठन, मरोड़ तथा उदरशूल होने लगता है। इसका मात्रानुसार विधिपूर्वक सेवन करना चाहिए।
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