पिठवन (Dabra)

     पिठवन के अतिरिक्त पिठवन की (Uraria lagopoides) तथा (Uraria rufescens) आदि जातियां पाई जाती हैं। दोनों के गुणधर्म समान हैं तथा दोनों ही प्रकार के पिठवन दशमूल में लघुंचमूल के अंग हैं। इन पर वर्षाकाल में फूल तथा शीतकाल में फली आती है। अथर्ववेद में पृश्निपर्णी को जीवाणुनाशक, कमजोरी दूर करने वाला तथा मोटापा को कम करने वाला माना जाता है। बृहत्रयी में रक्तार्श या खूनी बवासीर, वातविकार या गठिया के इलाज में मददगार होता है। चरक-संहिता में सूजन को कम करने वाला माना जाता है। पिठवन के पौधे पूरे भारत की ऊसर भूमि तथा जंगली प्रदेशों में, लगभग 2000 मी की ऊंचाई तक नैसर्गिक रूप से उत्पन्न होते हैं।

पिठवन के उपयोग

पिठवन की 10 ग्राम जड़ को 400 मिली पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष का काढ़ा बनाकर और काढ़े में मिश्री मिलाकर पिलाने से प्रतिश्याय यानि सर्दी-जुकाम में लाभ होता है।
ताम्र पत्ते में पृश्निपर्णी जड़, सेंधानमक तथा मरिच चूर्ण मिला कर काञ्जी से पीस कर आँखों में काजल की तरह लगाने से पिल्ल रोग से आराम मिलता है।
बकरी के दूध में आधा-भाग जल मिला कर समान मात्रा में सुगन्धबाला, नीलकमल, सोंठ तथा पृश्निपर्णी मिलाकर सिद्ध कर 10-20 मिली मात्रा में पीने से रक्तातिसार से आराम मिलता है।
रक्तार्श और शराब पीने की अधिकता से उत्पन्न शारीरिक समस्या में पिठवन और खिरैटी का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से अत्यन्त लाभ होता है। इसके अलावा बला की जड़ तथा पृश्निपर्णी के काढ़े से बना धान के लावे की पेया को पीने से बवासीर में होने वाले रक्तस्राव से जल्द राहत मिलती है।
पिठवन के 8-10 पत्तों को पीसकर लेप करने से भगन्दर में लाभ होता है।
10 मिली पिठवन पत्ते के रस का नियमित रूप से कुछ दिनों तक सेवन करने से भगन्दर रोग में लाभ होता है।
पिठवन के पत्तों में थोड़ा कत्था मिलाकर, पीसकर लेप करने से या कत्था तथा काली मिर्च समान मात्रा में मिलाकर, पीसकर पिलाने से भगन्दर में लाभ होता है।
10-20 मिली पिठवन पत्ता तथा जड़ के रस को पिलाने से प्लीहा विकारों में लाभ होता है।
पृश्निपर्णी के पञ्चाङ्ग को मोटा-मोटा कूटकर छाया में सुखाकर रखें। सुबह शाम 10 ग्राम की मात्रा में लेकर 400 मिली पानी में पकाएं, जब 100 मिली काढ़ा शेष रहे तब छानकर पिएं। इससे प्लीहावृद्धि, जलोदर, यकृत् व उदर सम्बन्धित रोगों में लाभ होता है।
पिठवन की जड़ों को पीसकर, इसका लेप नाभि, वस्ति और योनि पर करने से बच्चा सुख से उत्पन्न हो जाता है, बच्चा होते ही लेप को धो दें।
5 ग्राम पिठवन मूल के चूर्ण में 2 ग्राम हल्दी चूर्ण मिलाकर 21 दिन तक सेवन करने से लाभ होता है।
200 मिली बकरी के दूध में 5 ग्राम पिठवन मूल को डालकर, पकाकर, छानकर इसमें मधु एवं शर्करा मिलाकर पीने से वातरक्त या गठिया के दर्द से जल्दी आराम मिलता है।
पृश्निपर्णी, केवाँच बीज, हल्दी, दारुहल्दी, चमेली, मिश्री तथा काकोल्यादि गण की औषधियों से पकाये हुए घी को व्रण पर लगाने से तथा खाने से व्रण या घाव जल्दी ठीक हो जाता है।
बला और पृश्निपर्णी का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से मदात्ययजन्य तृष्णा (शराब पीने के बाद लगने वाली अत्यधिक प्यास) से आराम मिलता है।
मसूर तथा पृश्निपर्णी के काढ़े से बने यवागु या जूस का सेवन  करने से रक्तपित्त के इलाज में लाभ मिलता है।
अच्छी तरह से फूले फले पिठवन के पौधो की जड़ें को लाल धागे में बांधकर, मस्तक पर धारण करने से बुखार के कष्ट से जल्दी आराम मिलता है।
समान मात्रा में शालपर्णी तथा पृश्निपर्णी को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। 10-20 मिली काढ़े में मधु मिला कर मात्रानुसार सेवन कराने से अतिसार या दस्त से आराम मिलता है।
10 मिली पिठवन पञ्चाङ्ग के रस में शक्कर मिलाकर देने से वत्सनाभ (monkshood) के विष में लाभ होता है।

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